केले की खेती टिशू कल्चर विधि से


"टिशू कल्चर केले की खेती"

विषय की जानकारी में आपका स्वागत है।

टिशू कल्चर केला क्या है।

केले की खेती में महत्वपूर्ण जानकारी के बारे में आज बात होगी।

केले का वैज्ञानिक नाम मूसा पैराडीसिबाका है।

इसकी फैमिली मूॼेसी है।

केले का जन्म स्थान दक्षिण पूर्व एशिया माना जाता है।

केला एक ऐसा फल है। जो परिवार के सभी सदस्यों को प्रिय होता है।

इसके फल वर्षभर उपलब्ध रहते हैं।

केले के फल का उपयोग खाने के साथ-साथ सब्जी, आटा, चिप्स एवं अचार बनाने के रूप में होता है।

केले के बचे हुए भाग जैसे पत्तियां तने को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर उनके रेसे तैयार किए जाते हैं। 

साथ ही इससे वर्मी कंपोस्ट एवं कार्बनिक खाद भी बनाई जाती है।

टिशू कल्चर विधि द्वारा केले के पौधों का ॻुणन उत्तम माना जाता है।

क्योंकि इस विधि में जीवित वनस्पति के रोग रहित भाग से एक कोशिका या उत्तक लेकर प्रयोगशाला में जीवाणु रहित
पूर्ण नियंत्रित वातावरण
मे।
 
मात्र पौधे की विभिन्न विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए एक पौधे से अनेक पौधों का विकास किया जाता है।

जो कि मात्र पौधों के समान लक्षण वाले पौधे होते हैं।

केले की प्रमुख प्रजातियां 

ग्रैंड नैन जी 9, पूवन, चम्पा,
अमृत सागर, बसराई ड्वार्फ, सफ़ेद बेलची, लाल बेलची, हरी छाल, मालभोग, मोहनभोग और रोबस्टा  है।

केले के खेत का प्रबंधन

जल उपलब्ध होने पर केले की रोपाई वर्ष भर की जा सकती है।

केले की रोपाई फरवरी से अप्रैल के प्रथम सप्ताह व मानसून के शुरुआती जून-जुलाई में करनी चाहिए।

मानसून शुरू होने के साथ किसी भी समय पौधों का रोपण कर सकते हैं।

पौधरोपण से पूर्व मिट्टी की गहरी जुताई करके पाटा लगाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए।

तत्पश्चात रस्सी वा मीटर की सहायता से 2 मीटर लाइन से लाइन वह 2 मीटर पाैध से पैाध की दूरी पर निशान लगाकर  60x x60 x60 सेंटीमीटर आकार के गड्ढे खोदकर।

अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद 20 किलोग्राम की आधी मात्रा एवं वर्मी कंपोस्ट की 4 किलोग्राम की आधी मात्रा का मिश्रण एवं साथ ही केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थानलखनऊ के द्वारा विकसित किए गए  विभिन्न जैविक फॉर्मूलेशन के मिश्रण एवं सीएसआर बायो से मिट्टी का उपचार कर इस गड्ढे में भर कर टिशू कल्चर केले की पौध का रोपण कर हल्की सिंचाई कर देना चाहिए।

एवं शेष बचे मिश्रण की मात्रा का उपयोग 3 माह बाद पौधों के चारों   और थाला बना  कर सिंचाई करें।

गर्मियों के समय सिंचाई 5 से 10 दिन के अंतराल पर हल्की  एवं ठंडीओं के समय पर 15 से 20 दिन के अंतराल पर मिट्टी की नमी को ध्यान में रखते हुए करते रहना चाहिए।

टपक सिंचाई प्रणाली केले के लिए उत्तम रहती है।

ध्यान रहे केले के पौधों के चारों तरफ पानी ईकट्ठा नहीं होना चाहिए।

क्योंकि पानी के बीच में पौधे खड़े नहीं हो सकते हैं।

अतः जल निकास की उचित व्यवस्था करनी चाहिए।

वर्षा ऋतु के तुरंत बाद पौधों के तनों पर मिट्टी चढ़ानी चाहिए।

क्योंकि पौधों के गिरने की संभावना रहती है।

जब केले में फल आने लगता है तब पौधा धीरे-धीरे भारी होकर एक तरफ फल की और झुकता है।

यदि इस समय पौधों को सहारा ना दिया जाए तो पौधे जमीन से उखड़कर गिर जाते हैं।

केले के पौधे को गिरने से बचाने के लिए दों बासॊ आपस में बांधकर कैचीनुमा क्राश बनाकर पौधे को सहारा दिया जाता है।

यदि केले के गुच्छॊ का झुकाव पूर्व या दक्षिण की तरफ होता है तो फल तेज सूर्य प्रकाश से खराब हो सकते हैं।

साथ ही चिड़िया तोते आदि पक्षी चॊच से फल को नुकसान पहुंचाते हैं।

जिसकी सुरक्षा हेतु फल की बैगिंग या केले के पत्तों से ढक दिया जाना चाहिए।

फसल सुरक्षा हेतु पौधों का प्रतिदिन निरीक्षण करते रहना चाहिए।

यदि पौधों में कहीं भी असामान्य दाग धब्बे दिखाई दे तो या वील्ट रोक की दस्तक होती है।

सर्वप्रथम रोगों से बचाव हेतु उस भाग को सावधानीपूर्वक तेज चाकू से काट कर खेत से दूर जलाकर नष्ट कर देना चाहिए।

विल्ट के प्रकोप अधिक होने पर आईसीएआर-केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय अनुसंधान लखनऊ के द्वारा विकसित किए गए सीएसआर बायो एवं फ़ियूॼिकांड द्वारा पौधे का जड उपचार एवं मृदा उपचार करने से विल्ट की समस्या को दूर किया जाता है।

कीट नियंत्रण हेतु केले के पौधों में कुछ हानिकारक कीटों का प्रकोप होता है।

जिसमें से प्रमुख रूप से तना भेदक कीट, कंद भेदक, पत्ती खाने वाला कटर पिलर आदि हैं।
इन तीनों के नियंत्रण हेतु प्रमाणित कृषि केंद्रों से सिस्टमैटिक कीटनाशक लाकर उसकी 1 ml प्रति लीटर मात्रा का छिड़काव किया जाना चाहिए।

जैविक नियंत्रण के रूप में ट्राईकोगामा कार्ड का उपयोग करने से इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है।

आय एवं व्यय की गणना

10000 वर्ग मीटर में केले की खेती में पैाध से पाैध की दूरी  2 मीटर एवं
लाइन से लाइन की दूरी 2 मीटर रखने पर कुल 2500 पौधे लगेंगे।

प्रति पौध लगभग 35 किलो  केले का उत्पादन होगा।

जिसमें प्रति हेक्टेयर कुल लगभग 87500 किलो गुणवत्तायुक्त स्वादिष्ट फल प्राप्त होंगे

जिनका बाजार भाव ₹10 रखने पर कुल मूल्य लगभग ₹8,75,000 प्राप्त होगा।

जिसमें से खेत की जुताई, सिंचाई,खाद, कीटनाशक एवं टिशू कल्चर पौधे हेतु कुल ₹1,50,000 लागत घटाने पर

कुल वार्षिक शुद्ध लाभ लगभग  ₹7,25,000 प्राप्त होगा।


अधिक जानकारी हेतु आईसीआर  -केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थान लखनऊ से संपर्क करें।


डॉ श्यामजी मिश्रा

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