रामचरितमानस के दोहे तथा भावार्थ
अस कहि चलेउ सबहि सिरु नाई।
सुमन धनुष कर सहित सहाई॥
चलत मार अस हृदयँ बिचारा।
सिव बिरोध ध्रुब मरनु हमारा॥
भावार्थ:-यों कह और सबको सिर नवाकर कामदेव अपने पुष्प के धनुष को हाथ में लेकर (वसन्तादि) सहायकों के साथ चला। चलते समय कामदेव ने हृदय में ऐसा विचार किया कि शिवजी के साथ विरोध करने से मेरा मरण निश्चित है॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
तब आपन प्रभाउ बिस्तारा।
निज बस कीन्ह सकल संसारा॥
कोपेउ जबहिं बारिचरकेतू।
छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू॥
भावार्थ:-तब उसने अपना प्रभाव फैलाया और समस्त संसार को अपने वश में कर लिया। जिस समय उस मछली के चिह्न की ध्वजा वाले कामदेव ने कोप किया, उस समय क्षणभर में ही वेदों की सारी मर्यादा मिट गई॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
सब के हृदयँ मदन अभिलाषा।
लता निहारि नवहिं तरु साखा॥
नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाईं।
संगम करहिं तलाव तलाईं॥
भावार्थ:-सबके हृदय में काम की इच्छा हो गई। लताओं (बेलों) को देखकर वृक्षों की डालियाँ झुकने लगीं। नदियाँ उमड़-उमड़कर समुद्र की ओर दौड़ीं और ताल-तलैयाँ भी आपस में संगम करने (मिलने-जुलने) लगीं॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
सब के हृदयँ मदन अभिलाषा।
लता निहारि नवहिं तरु साखा॥
नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाईं।
संगम करहिं तलाव तलाईं॥
भावार्थ:-सबके हृदय में काम की इच्छा हो गई। लताओं (बेलों) को देखकर वृक्षों की डालियाँ झुकने लगीं। नदियाँ उमड़-उमड़कर समुद्र की ओर दौड़ीं और ताल-तलैयाँ भी आपस में संगम करने (मिलने-जुलने) लगीं॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
*(आरती दर्शन)*👇
https://youtu.be/mJJ-7vb0pgI
जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी।
को कहि सकइ सचेतन करनी॥
पसु पच्छी नभ जल थल चारी।
भए काम बस समय बिसारी॥
भावार्थ:-जब जड़ (वृक्ष, नदी आदि) की यह दशा कही गई, तब चेतन जीवों की करनी कौन कह सकता है? आकाश, जल और पृथ्वी पर विचरने वाले सारे पशु-पक्षी (अपने संयोग का) समय भुलाकर काम के वश में हो गए॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी।
को कहि सकइ सचेतन करनी॥
पसु पच्छी नभ जल थल चारी।
भए काम बस समय बिसारी॥
भावार्थ:-जब जड़ (वृक्ष, नदी आदि) की यह दशा कही गई, तब चेतन जीवों की करनी कौन कह सकता है? आकाश, जल और पृथ्वी पर विचरने वाले सारे पशु-पक्षी (अपने संयोग का) समय भुलाकर काम के वश में हो गए॥
मदन अंध ब्याकुल सब लोका। निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका॥
देव दनुज नर किंनर ब्याला।
प्रेत पिसाच भूत बेताला॥
भावार्थ:-सब लोक कामान्ध होकर व्याकुल हो गए। चकवा-चकवी रात-दिन नहीं देखते। देव, दैत्य, मनुष्य, किन्नर, सर्प, प्रेत, पिशाच, भूत, बेताल-॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
मदन अंध ब्याकुल सब लोका। निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका॥
देव दनुज नर किंनर ब्याला।
प्रेत पिसाच भूत बेताला॥
भावार्थ:-सब लोक कामान्ध होकर व्याकुल हो गए। चकवा-चकवी रात-दिन नहीं देखते। देव, दैत्य, मनुष्य, किन्नर, सर्प, प्रेत, पिशाच, भूत, बेताल-॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
*||आज का श्रृंगार दर्शन||*
कालिकन धाम,अमेठी,उत्तर प्रदेश
*(आरती दर्शन)*👇
https://youtu.be/aGpkRbtpfPg
उभय घरी अस कौतुक भयऊ।
जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ॥
सिवहि बिलोकि ससंकेउ मारू।
भयउ जथाथिति सबु संसारू॥
भावार्थ:-दो घड़ी तक ऐसा तमाशा हुआ,जब तक कामदेव शिवजी के पास पहुँच गया। शिवजी को देखकर कामदेव डर गया,तब सारा संसार फिर जैसा-का तैसा स्थिर हो गया।
इन्ह कै दसा न कहेउँ बखानी।
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
*उभय घरी अस कौतुक भयऊ।*
*जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ॥*
*सिवहि बिलोकि ससंकेउ मारू।*
*भयउ जथाथिति सबु संसारू॥*
*भावार्थ*:-दो घड़ी तक ऐसा तमाशा हुआ,जब तक कामदेव शिवजी के पास पहुँच गया। शिवजी को देखकर कामदेव डर गया,तब सारा संसार फिर जैसा-का तैसा स्थिर हो गया।
इन्ह कै दसा न कहेउँ बखानी।
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
फिरत लाज कछु करि नहिं जाई।
मरनु ठानि मन रचेसि उपाई॥
प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा।
कुसुमित नव तरु राजि बिराजा॥
भावार्थ:-लौट जाने में लज्जा मालूम होती है और करते कुछ बनता नहीं। आखिर मन में मरने का निश्चय करके उसने उपाय रचा। तुरंत ही सुंदर ऋतुराज वसन्त को प्रकट किया। फूले हुए नए-नए वृक्षों की कतारें सुशोभित हो गईं॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
*सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत।*
*चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदयनिकेत॥*
*भावार्थ:-कामदेव अपनी सेना समेत करोड़ों प्रकार की सब कलाएँ (उपाए) करके हार गया, पर शिवजी की अचल समाधि न डिगी। तब कामदेव क्रोधित हो उठा॥*
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
छाड़े बिषम बिसिख उर लागे।
छूटि समाधि संभु तब जागे॥
भयउ ईस मन छोभु बिसेषी।
नयन उघारि सकल दिसि देखी॥
भावार्थ:-कामदेव ने तीक्ष्ण पाँच बाण छोड़े, जो शिवजी के हृदय में लगे। तब उनकी समाधि टूट गई और वे जाग गए। ईश्वर (शिवजी) के मन में बहुत क्षोभ हुआ। उन्होंने आँखें खोलकर सब ओर देखा॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
जोगी अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरुछित भई।
रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं गई॥
भावार्थ:-योगी निष्कंटक हो गए, कामदेव की स्त्री रति अपने पति की यह दशा सुनते ही मूर्च्छित हो गई। रोती-चिल्लाती और भाँति-भाँति से करुणा करती हुई वह शिवजी के पास गई।
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
जब जदुबंस कृष्न अवतारा।
होइहि हरन महा महिभारा॥
कृष्न तनय होइहि पति तोरा।
बचनु अन्यथा होइ न मोरा॥
भावार्थ:-जब पृथ्वी के बड़े भारी भार को उतारने के लिए यदुवंश में श्री कृष्ण का अवतार होगा,तब तेरा पति उनके पुत्र (प्रद्युम्न) के रूप में उत्पन्न होगा। मेरा यह वचन अन्यथा नहीं होगा॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
जब जदुबंस कृष्न अवतारा।
होइहि हरन महा महिभारा॥
कृष्न तनय होइहि पति तोरा।
बचनु अन्यथा होइ न मोरा॥
भावार्थ:-जब पृथ्वी के बड़े भारी भार को उतारने के लिए यदुवंश में श्री कृष्ण का अवतार होगा,तब तेरा पति उनके पुत्र (प्रद्युम्न) के रूप में उत्पन्न होगा। मेरा यह वचन अन्यथा नहीं होगा॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
सब सुर बिष्नु बिरंचि समेता।
गए जहाँ सिव कृपानिकेता॥
पृथक-पृथक तिन्ह कीन्हि प्रसंसा।
भए प्रसन्न चंद्र अवतंसा॥
भावार्थ:-फिर वहाँ से विष्णु और ब्रह्मा सहित सब देवता वहाँ गए,जहाँ कृपा के धाम शिवजी थे। उन सबने शिवजी की अलग-अलग स्तुति की,तब शशिभूषण शिवजी प्रसन्न हो गए।
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
सकल सुरन्ह के हृदयँ अस संकर परम उछाहु।
निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु॥
भावार्थ:-हे शंकर! सब देवताओं के मन में ऐसा परम उत्साह है कि हे नाथ! वे अपनी आँखों से आपका विवाह देखना चाहते हैं॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
अवसरु जानि सप्तरिषि आए।
तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए॥
प्रथम गए जहँ रहीं भवानी।
बोले मधुर बचन छल सानी॥
भावार्थ:-उचित अवसर जानकर सप्तर्षि आए और ब्रह्माजी ने तुरंत ही उन्हें हिमाचल के घर भेज दिया। वे पहले वहाँ गए जहाँ पार्वतीजी थीं और उनसे छल से भरे मीठे (विनोदयुक्त, आनंद पहुँचाने वाले) वचन बोले-॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
सुनि बोलीं मुसुकाइ भवानी।
उचित कहेहु मुनिबर बिग्यानी॥
तुम्हरें जान कामु अब जारा।
अब लगि संभु रहे सबिकारा॥
भावार्थ:-यह सुनकर पार्वतीजी मुस्कुराकर बोलीं- हे विज्ञानी मुनिवरों! आपने उचित ही कहा। आपकी समझ में शिवजी ने कामदेव को अब जलाया है, अब तक तो वे विकारयुक्त (कामी) ही रहे!।।
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
तौ हमार पन सुनहु मुनीसा।
करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा॥
तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा।
सोइ अति बड़ अबिबेकु तुम्हारा॥
भावार्थ:-तो हे मुनीश्वरो! सुनिए, वे कृपानिधान भगवान मेरी प्रतिज्ञा को सत्य करेंगे। आपने जो यह कहा कि शिवजी ने कामदेव को भस्म कर दिया,यही आपका बड़ा भारी अविवेक है॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
हियँ हरषे मुनि बचन सुनि देखि प्रीति बिस्वास।
चले भवानिहि नाइ सिर गए हिमाचल पास॥
भावार्थ:-पार्वती के वचन सुनकर और उनका प्रेम तथा विश्वास देखकर मुनि हृदय में बड़े प्रसन्न हुए। वे भवानी को सिर नवाकर चल दिए और हिमाचल के पास पहुँचे॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
हृदयँ बिचारि संभु प्रभुताई।
सादर मुनिबर लिए बोलाई।
सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई।
बेगि बेदबिधि लगन धराई॥
भावार्थ:-शिवजी के प्रभाव को मन में विचार कर हिमाचल ने श्रेष्ठ मुनियों को आदरपूर्वक बुला लिया और उनसे शुभ दिन,शुभ नक्षत्र और शुभ घड़ी शोधवाकर वेद की विधि के अनुसार शीघ्र ही लग्न निश्चय कराकर लिखवा लिया॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
लगन बाचि अज सबहि सुनाई।
हरषे मुनि सब सुर समुदाई॥
सुमन बृष्टि नभ बाजन बाजे।
मंगल कलस दसहुँ दिसि साजे॥
भावार्थ:-ब्रह्माजी ने लग्न पढ़कर सबको सुनाया,उसे सुनकर सब मुनि और देवताओं का सारा समाज हर्षित हो गया। आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी,बाजे बजने लगे और दसों दिशाओं में मंगल कलश सजा दिए गए॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
*||आज का श्रृंगार दर्शन||*
कालिकन धाम,अमेठी,उत्तर प्रदेश
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा।
चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा॥
देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं।
बर लायक दुलहिनि जग नाहीं॥
भावार्थ:-एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू सुशोभित है। शिवजी बैल पर चढ़कर चले। बाजे बज रहे हैं। शिवजी को देखकर देवांगनाएँ मुस्कुरा रही हैं (और कहती हैं कि) इस वर के योग्य दुलहिन संसार में नहीं मिलेगी॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
*||आज का श्रृंगार दर्शन||*
कालिकन धाम,अमेठी,उत्तर प्रदेश
मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं।
हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं॥
अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे।
भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे॥
भावार्थ:-महादेवजी (यह देखकर) मन-ही-मन मुस्कुराते हैं कि विष्णु भगवान के व्यंग्य-वचन (दिल्लगी) नहीं छूटते! अपने प्यारे (विष्णु भगवान) के इन अति प्रिय वचनों को सुनकर शिवजी ने भी भृंगी को भेजकर अपने सब गणों को बुलवा लिया॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
*||आज का श्रृंगार दर्शन||*
कालिकन धाम,अमेठी,उत्तर प्रदेश
जस दूलहु तसि बनी बराता।
कौतुक बिबिध होहिं मग जाता॥
इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना।
अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना॥
भावार्थ:-जैसा दूल्हा है, अब वैसी ही बारात बन गई है। मार्ग में चलते हुए भाँति-भाँति के कौतुक (तमाशे) होते जाते हैं। इधर हिमाचल ने ऐसा विचित्र मण्डप बनाया कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
सैल सकल जहँ लगि जग माहीं।
लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं॥
बन सागर सब नदी तलावा।
हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा॥
भावार्थ:-जगत में जितने छोटे-बड़े पर्वत थे, जिनका वर्णन करके पार नहीं मिलता तथा जितने वन, समुद्र,नदियाँ और तालाब थे,हिमाचल ने सबको नेवता भेजा॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
*||आज का श्रृंगार दर्शन||*
प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवराए।
जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए॥
पुर सोभा अवलोकि सुहाई।
लागइ लघु बिरंचि निपुनाई॥
भावार्थ:-हिमाचल ने पहले ही से बहुत से घर सजवा रखे थे। यथायोग्य उन-उन स्थानों में सब लोग उतर गए। नगर की सुंदर शोभा देखकर ब्रह्मा की रचना चातुरी भी तुच्छ लगती थी।।
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
*||आज का श्रृंगार दर्शन||*
कालिकन धाम,अमेठी,उत्तर प्रदेश
जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ।
रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ॥
भावार्थ:-जिस नगर में स्वयं जगदम्बा ने अवतार लिया, क्या उसका वर्णन हो सकता है? वहाँ ऋद्धि,सिद्धि,सम्पत्ति और सुख नित-नए बढ़ते जाते हैं॥
*🔱🚩जय माँ कालिका🚩🔱*
*||आज का श्रृंगार दर्शन||*
कालिकन धाम,अमेठी,उत्तर प्रदेश
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